SHANIDEV, The God Who Rides Crows, The Many Tales Behind Pitru Paksha Shraddh

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SHANIDEV : ये है शनिदेव की सवारी और यमराज का पुत्र, इसमें विचरण करती है पितरों की आत्मा

पटना. 15 दिनों तक चलनेवाले पित्तृपक्ष शुरु हो गया है। अपने पितरों को पिंड दान करने के लिए बड़ी संख्या में लोग गया पहुंचने लगे हैं। ये लोग पितरों को यहां पर श्राद्ध एवं तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए पूजा करेंगे। सनातन, हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा निवेदन के लिए पितृपक्ष पखवाड़े का विशेष महत्व है। वैदिक महामंत्रों में इसमें कौआ का विशेष महत्व है। यमस्वरूप है कौआ…

कौआ यमस्वरूप है। इसे यमराज का पुत्र एवं शनिदेव का वाहक कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि देह त्यागने के बाद लोग स्वर्ग और नरक कौए की सवारी कर के ही जाते हैं। बाल्मिकी रामायण के काम भुसुंडी में इस बात का वर्णन मिलता है। माना जाता है कि कौए के रुप में हमारे पूर्वज भोजन करते हैं। कौए के भोजन कराने से लोगों के सभी तरह के दोष दूर हो जाते हैं।

पितरों को प्राप्त होता है काक बलि

धर्म शास्त्र के श्राद्ध परिजात में वर्णन है कि तालाब और नदियों में अपने तर्पण देने, पितरों से आशीर्वाद लेने, ब्राह्मणों के अलावा गाय एवं कौआ को भोजन देने का विशेष महात्मय पितृपक्ष में है। शास्त्रों में पितृपक्ष गौ ग्रास के साथ काक बलि देने की भी मान्यता है। इसके बिना तर्पण अधूरा है। मृत्यु लोक के प्राणी द्वारा काक बलि के तौर पर कौओं को दिया गया भोजन पितरों को प्राप्त होता है।

मान्यता है कि पृथ्वी पर जब तक यमराज रहेंगे तब तक कौआ का विनाश नहीं हो सकता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कौए ने अमृत का स्वाद चख लिया था। इसी कारण से उसकी स्वभाभिक मोत नहीं होती। जब भी उसकी मौत होती है कौए की अकाल मौत होती है।

राम ने दिया वरदान

हिन्दू पुराणों में कौए को देवपुत्र माना गया है। एक कथा है कि इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। त्रेता युग की घटना कुछ इस प्रकार हैं – जयंत ने कौऐ का रूप धर कर माता सीता को घायल कर दिया था। तब भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जयंत ने अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा।

 

 

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